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ऑटो विवाद और झड़प के बाद बोले CM फडणवीस

मराठी प्राथमिकता पर संघर्ष बर्दाश्त नहीं

मराठी प्राथमिकता पर संघर्ष बर्दाश्त नहीं: ऑटो विवाद और झड़प के बाद बोले CM फडणवीस

मुंबई : महाराष्ट्र की राजधानी में ऑटो-रिक्शा चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य करने के नियम को लेकर छिड़ा विवाद अब राजनीतिक हिंसा में तब्दील हो गया है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं और पूर्व सांसद संजय निरुपम के समर्थकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कड़ा रुख अपनाया है।

मुख्यमंत्री का बड़ा बयान

घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि राज्य में ‘मराठी’ को प्राथमिकता मिलना स्वाभाविक है और सरकार इसके पक्ष में है, लेकिन भाषा के नाम पर आपसी संघर्ष और हिंसा को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा, “मराठी प्राथमिकता संघर्ष का कारण नहीं बननी चाहिए।”

कैसे शुरू हुआ विवाद?

पूरा विवाद राज्य सरकार के उस हालिया प्रस्ताव से जुड़ा है, जिसमें ऑटो-रिक्शा चालकों के लिए मराठी बोलना अनिवार्य करने की बात कही गई है। इस नियम के विरोध में हिंदी भाषी चालकों के समर्थन में शिवसेना नेता संजय निरुपम शुक्रवार दोपहर करीब 3:30 बजे गणपत पाटिल नगर पहुँचे थे।

विरोध, हमला और गिरफ्तारी

संजय निरुपम के कार्यक्रम के दौरान ही एमएनएस कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गए और नारेबाजी शुरू कर दी। तनाव तब और बढ़ गया जब निरुपम के वापस लौटते समय उनके वाहन पर हमला किया गया और तोड़फोड़ की गई।

पुलिसिया कार्रवाई की मुख्य बातें:

गिरफ्तारी: पुलिस ने घटना के तुरंत बाद 11 एमएनएस कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया। बाद में उन्हें गैरकानूनी सभा और तोड़फोड़ के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।

लगी धाराएं: आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 और महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

आयोजकों पर भी शिकंजा: पुलिस ने बिना अनुमति सभा करने के आरोप में शिवसेना कार्यकर्ता राम यादव के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है। बताया जा रहा है कि पुलिस की चेतावनी के बावजूद करीब 60 ऑटो चालकों और 40 कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाई गई थी।

कानून-व्यवस्था पर सवाल

मुंबई के इस घटनाक्रम ने एक बार फिर भाषा और पहचान की राजनीति को गरमा दिया है। जहाँ एक तरफ एमएनएस अपनी ‘मराठी कार्ड’ की नीति पर अडिग है, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अस्मिता की रक्षा कानून के दायरे में रहकर ही होनी चाहिए।

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